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Wednesday, 15 November 2017

tanav ke sagar me dubti jivan naiyya तनाव के सागर में डूबती जीवन नैय्या



आज के आधुनिक दौर में हमने खुद को एक मशीन का रूप दे दिया है ! जीवन में कुछ करने की ललक और समाज में खुद को स्थापित करने की जिद मात्र से मनुष्य भीतरी स्वभाव से खोखला , असंवेदनशील एवं एकाकीपन का जीवन जी रहा है ! परिवारजनों के साथ बैठना कुछ पल उनके साथ बिताकर अपने और सबके सुख-दुःख की बातचीत , अब ये दौर पीछे छूट गया है !
                 कहने को तो आज हमारे पास एक-दूसरे से जुड़ने के कई माध्यम है , पर यह माध्यम केवल मशीनी माध्यम के तौर पर ही है, इसमें अपनत्व का अहसास कहाँ? ऐसे में युवा पीढ़ी एक दोहरी जिंदगी जी रही है ! एक मुखौटे का सहारा लिए, जहाँ बाहरी आवरण बहुत चमकदार है पर भीतर ही भीतर एक एकाकी जीवन है जहाँ कोई अपना ना दीखता हो जिससे वह अपने मन की बात कह सके ! एक घुटनभरी जिंदगी आखिर कबतक सहन कर सकता है कोई ? कई परिणाम हमारे सामने है , ऐसे तनावग्रस्त युवा द्वारा कई मामले हमारे सामने आए है जब युवा पीढ़ी ने तनावग्रस्त होकर आत्महत्या की है तो क्यों नहीं इसकी जाँच माता-पिता खुद करें ! अपने बच्चों से एक मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखें ! उसपर पढ़ाई या अन्य किसी भी बात का दबाव ना हो, घर का वातावरण मैत्रीपूर्ण हो , जिससे वे आपको अपने मन की बातें और तकलीफे खुले विचारों में सहज रूप से आपके सामने रख सके !
               परिवार के वरिष्ठ भी बच्चे की भावनाओं को समझते हुए उनकी इक्छा उनकी रूचि का सम्मान करते हुए उनको सही दिशा दें ! ऐसा ना हो की कहीं आपकी महत्वकांछा आपको आपके बच्चे से दूर कर दे ! बच्चों से जुड़ने का उनके मन से जुड़ने का एक प्रयास तो होना ही चाहिए ! क्यूंकि जीवन समाप्त हो जाएगा तो सब समाप्त हो जाएगा ! साड़ी की सारी महत्वकांछा धरी की धरी रह जाएगी और हाथ आएगी तो केवल हार ! इसलिए अपने इक्छाओं की अग्नि में अपने बच्चों के आहुति देना अपने ही कोख को सूना करना है बच्चे और माता-पिता दोनों को हो एक-दूजे की भावनाओं को समझाना होगा ! एक बात बच्चों को समझना बहुत जरुरी है कि माता -पिता से बढ़कर हमारा भला चाहनेवाला इस दुनिया में कोई नहीं है !
                                
                                                                

4 comments:

  1. बहुत दिनों बाद फुर्सत से आपकी सारी रचनाएँ पढ़ी...बहुत बहुत बधाई

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद संजय जी

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    2. सच कहा आपने....
      जीवन में कुछ करने की ललक और समाज में खुद को स्थापित करने की जिद मात्र से मनुष्य भीतरी स्वभाव से खोखला , असंवेदनशील एवं एकाकीपन का जीवन जी रहा है।
      विलम्ब से प्रतिक्रिया और देर से ब्लाॅग तक पहुचने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

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    3. बहुत-बहुत धन्यवाद पुरुषोत्तम जी

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